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मधुमेह की बीमारी का उत्तराखंड की पारंपरिक अनाजों में इलाज

आधुनिक उपचार और प्रबंधन के तरीके

मधुमेह की बीमारी का उत्तराखंड की पारंपरिक अनाजों में इलाज
आधुनिक उपचार और प्रबंधन के तरीके
अपनी थाली में मंडुआ और झंगोरा जैसे अनाज जरूरी
मिलेट्स को बढ़ावा दे रही उत्तराखण्ड सरकार 
देहरादून। आज के दौर में मधुमेह यानी डायबिटीज एक ऐसी वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है जो उम्र और भूगोल की सीमाओं को लांघ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि जीवनशैली में आए बदलावों के कारण भारत विशेष रूप से इस बीमारी का केंद्र बनता जा रहा है। मधुमेह मूल रूप से शरीर की चयापचय प्रक्रिया में आई एक ऐसी गड़बड़ी है जहां रक्त में शर्करा का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है। जब हमारा शरीर भोजन से प्राप्त ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलने में विफल रहता है तो यह स्थिति उत्पन्न होती है। इस लेख के माध्यम से हम मधुमेह के प्रकारों, उनके कारणों, उपचार की आधुनिक पद्धतियों और विशेष रूप से उत्तराखंड की उन पारंपरिक फसलों की चर्चा करेंगे जो इस बीमारी के प्रबंधन में रामबाण सिद्ध हो रही हैं।
मधुमेह को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है जिन्हें टाइप 1 और टाइप 2 कहा जाता है। इन दोनों की प्रकृति और होने के कारण एक-दूसरे से काफी अलग हैं। टाइप 1 मधुमेह को अक्सर एक ऑटोइम्यून बीमारी के रूप में देखा जाता है। इसमें शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र अपनी ही उन कोशिकाओं पर हमला कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं। यह स्थिति आमतौर पर बच्चों या किशोरों में देखी जाती है और इसमें शरीर इंसुलिन का निर्माण बिल्कुल बंद कर देता है। इसके विपरीत टाइप 2 मधुमेह एक जीवनशैली जनित समस्या है जो धीरे-धीरे विकसित होती है। इसमें शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या फिर कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति संवेदनशील नहीं रह जाती हैं। दुनिया भर में मधुमेह के कुल मामलों में से लगभग नब्बे प्रतिशत मामले टाइप 2 श्रेणी के ही होते हैं।
मधुमेह के लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है क्योंकि अक्सर टाइप 2 के मामले कई वर्षों तक दबे रहते हैं। इसके सामान्य लक्षणों में अत्यधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, हर समय थकान महसूस होना और बिना किसी कारण के वजन कम होना शामिल है। इसके अलावा घावों का देरी से भरना और आंखों की रोशनी में धुंधलापन आना भी हाई ब्लड शुगर के संकेत हो सकते हैं। टाइप 1 के मामले में ये लक्षण बहुत तेजी से उभरते हैं जबकि टाइप 2 में ये इतने धीमे होते हैं कि व्यक्ति इन्हें सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज कर देता है। नियमित अंतराल पर रक्त परीक्षण ही इसकी पहचान का सबसे सटीक तरीका है।
मधुमेह का उपचार मुख्य रूप से ब्लड शुगर को एक नियंत्रित सीमा के भीतर रखने पर केंद्रित होता है। टाइप 1 मधुमेह के रोगियों के लिए इंसुलिन लेना अनिवार्य होता है क्योंकि उनका शरीर स्वयं इसका उत्पादन नहीं कर पाता। आधुनिक विज्ञान ने अब इंसुलिन पंप और पेन जैसे आसान साधन उपलब्ध करा दिए हैं। वहीं टाइप 2 मधुमेह के प्रबंधन में दवाओं के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव की सबसे बड़ी भूमिका होती है। मेटफॉर्मिन जैसी दवाएं शरीर को इंसुलिन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने में मदद करती हैं। हालांकि चिकित्सक अब दवाओं के बजाय संतुलित आहार और शारीरिक सक्रियता पर अधिक जोर देते हैं। योग और प्राणायाम भी इस बीमारी को नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध हुए हैं।
मधुमेह के साथ एक लंबा और स्वस्थ जीवन जीना पूरी तरह संभव है बशर्ते हम अनुशासन का पालन करें। यह बीमारी हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संकेत देती है। उत्तराखंड के पारंपरिक खान-पान और शुद्ध वातावरण में इस बीमारी से लड़ने की अपार शक्ति मौजूद है। यदि हम अपनी थाली में मंडुआ और झंगोरा जैसे स्थानीय अनाजों को फिर से स्थान दें और आधुनिक जीवन की निष्क्रियता को त्याग दें, तो मधुमेह के बढ़ते बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से ही हम इस साइलेंट किलर को हरा सकते हैं और आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ भविष्य दे सकते हैं।
उत्तराखंड की फसलों का विशेष महत्व
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली पारंपरिक फसलें अब पूरी दुनिया में अपने औषधीय गुणों के लिए जानी जा रही हैं। मंडुआ और झंगोरा जैसी फसलें मधुमेह के रोगियों के लिए किसी प्राकृतिक औषधि से कम नहीं हैं। ये फसलें न केवल पोषण से भरपूर हैं बल्कि इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत कम होता है। पहाड़ के पूर्वजों ने सदियों से इन अनाजों का सेवन किया और वे मधुमेह जैसी बीमारियों से दूर रहे। आज के समय में जब पूरी दुनिया मिलेट्स की ओर लौट रही है, तब उत्तराखंड की इन फसलों की मांग वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है।
मंडुआ के गुण और मधुमेह में लाभ
मंडुआ जिसे रागी या कोदा भी कहा जाता है, कैल्शियम और फाइबर का उत्कृष्ट स्रोत है। इसमें मौजूद जटिल कार्बाेहाइड्रेट शरीर में ग्लूकोज के अवशोषण को धीमा कर देते हैं। इससे भोजन के बाद रक्त में शर्करा का स्तर अचानक नहीं बढ़ता। मंडुआ में पाए जाने वाले पॉलीफेनोल्स शरीर की सूजन को कम करने और इंसुलिन की प्रभावशीलता बढ़ाने में मदद करते हैं। यह अनाज ग्लूटेन मुक्त होता है और पचने में आसान होने के साथ-साथ हड्डियों को भी मजबूती प्रदान करता है। मधुमेह के रोगियों के लिए गेहूं की रोटी के स्थान पर मंडुआ की रोटी एक स्वस्थ विकल्प है।
झंगोरा का औषधीय प्रभाव
झंगोरा जिसे स्थानीय स्तर पर एक प्रमुख अनाज माना जाता है, टाइप 2 मधुमेह के रोगियों के लिए अत्यंत गुणकारी है। इसका सबसे बड़ा लाभ इसका न्यूनतम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होना है। झंगोरा में रेसिस्टेंट स्टार्च की मात्रा अधिक होती है जो न केवल शुगर को नियंत्रित करती है बल्कि हृदय स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर है। यह शरीर के खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में भी मदद करता है। झंगोरा की खीर या पुलाव बनाकर इसे चावल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके नियमित सेवन से मोटापा कम करने में भी मदद मिलती है जो मधुमेह का एक प्रमुख कारण है।

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